बुधवार, 13 मई 2009

," नक्षत्र-1 "



." नक्षत्र -1" भारतीय ज्योतिष - विज्ञानं में नक्षत्रों का बहुत महत्त्व है , अगर मैं यह कहूँ की भारतीय ज्योतिष [ या पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार हिंदू -ज्योतिष ] का मूल-आधार ही '' नक्षत्र '' ही हैं तो ज्यादा उचित होगा । रामायण, महाभारत आदि प्राचीन कथानकों में भी ज्योतिषीय गणना हो या फलित- कथन अथवा काल या समय गणना नक्षत्रों के आधार पर ही की गयी है ; चाहे वह राम के राज्याभिषेक के सन्दर्भ में हो,
देंखें अध्याय 19 श्लोक 4 या फ़िर इसी सन्दर्भ यह श्लोक देखे
'' अद्य चन्द्रोSभ्युपगमन् पुष्यात् पूर्व पुनर्वसुम् पुष्य योग नियतं वक्ष्यन्ते दैवं चिन्तका: "
अर्थात फलित का विचार करने वाले बतारहे हैं कि अभी चंद्रमा पुनर्वसु [ नक्षत्र ] में है और शीघ्र ही पुष्य [ नक्षत्र ] में आने वाला है इसे वे योगप्रद [ राज्याभिषेक के लिए शुभ ] कहते हैं । इसी प्रकार पांडवों के अज्ञातवास काल के समय कौरवों द्वारा राजा विराट की गौओं का अपहरण करने पर विराट पुत्र उत्तर द्वारा उन्हें छुडाने जाने और बृह- न्नला के रूप में अज्ञातवास व्यतीत कर रहे अर्जुन का सारथी के रूप में साथ जाने और उत्तर के स्थान पर स्वयं युद्ध करने के पूर्व शंखनाद करने पर कौरवों द्वारा अर्जुन की शंख - ध्वनि पहचान कर यह सोचते हुए प्रसन्न होने कि समय- पूर्व अज्ञातवास में पहचान लिए जाने के कारण पांडवों को पुनः 14 वर्षों केलिए वनवास जाना पड़ेगा , और उनका राज इतने काल के लिए निष्कंटक हो जाएगा
पर भीष्म-पिताहामा द्वारा अज्ञातवास काल की समाप्ति कि गणना के लिए नक्षत्रों का उल्लेख अथवा कृष्ण के कर्ण से मिलने जाने पर चर्चा के दौरान कर्ण द्वारा अशुभ काल आने की संभावना प्रकट करते हुए काल-गणना हेतु नक्षत्रों का प्रयोग ,
भारतीय ज्योतिष क्या विश्व की इन दो प्राचीनतम रचनाओं में नक्षत्रों का उल्लेख स्पष्ट कर देता कि भारतीयों को ही इसका ज्ञान बहुत पहले से यानि अज्ञात काल से था ।
मैंने स्वयं तो मूल नही देखा है परन्तु तैत्तिरीय ब्राह्मण का एक उल्लेख अवश्य ही देखा है यथाः ,
" कृत्तिकास्वाग्निमादधीत् एतद्वा अग्ने नमस्तम्
यत्कृंत्तिका
: स्वायामेवैनम् देवतायामाधाय ब्रह्मवर्चसी भवति "
अर्थात कृत्तिका नक्षत्र में अग्नि का आधान करें । इस प्रकार अग्नि का आधान कर [उत्पन्न कर ] प्रणाम करें और कृत्तिका के नक्षत्र -देवता की आराधना कर मनुष्य ब्रह्म -तेज को प्राप्त होता है ।"
सनातन धर्म [हिंदू ] के तीज -त्योहारों के निर्धारण गणना में भी ' नक्षत्र ' प्रमुख इकाई होतें हैं हो । पूरी की पूरी हिंदू काल गणना ही नक्षत्रों के आधार पर ही की जाती है , महीनो के नाम भी यथा :- चैत्र :: चित्रा नक्षत्र से तो वैशाख ; विशाखा से अथवा कार्तिक मास : कृतिका नक्षत्र इत्यादि से ही ग्रहण किए गए , हैं, माह की पूर्णमासी [ पूर्णिमा ] को अथवा एकदिन आगे-पीछे अवश्य ही वह नक्षत्र होता है जिसके नाम पर माह का नाम होता है ।

यहाँ पर एक तथ्य स्पष्ट करना उचित होगा कि भारतीय काल -गणना में दिनांक अथवा तिथि की गणना तात्कालिक सूर्य एवं चंद्रमा के मध्य अंशों में स्थिति के अन्तर के आधार पर की जाती है , 12 * -12 * [डिग्री ] इस आधार पर सूर्य और चंद्र के मध्य 168 * [ डिग्री ] अन्तर होने पर उजाले या शुक्ल पाख [पक्ष ] 15 वीं तिथि [दिन ] को वहां पर जहाँ माह अमावस्या को पूर्ण होता है और जहाँ माह पूर्णमासी को पूर्ण होता है वहां पर 30 तिथि [दिन] अर्थात 15 दिन [ तिथि ] के कृष्ण -पक्ष के बाद 14 दिन बाद 15 वें दिन माह के नाम का नक्षत्र पड़ेगा [अथवा एक दिन पूर्व पड़ेगा ] इसी का समान्ज्स बैठाने के लिए ही ' अषाढ़ , फाल्गुनी , भाद्रपद ' इन तीन नक्षत्रों के दो-दो ' पूर्व एवं उत्तर ' विभाग किए गए हैं ,यथा पूर्वाषाढ़- उत्तराषाढ़ ,पूर्व फाल्गुनी - उत्तर फाल्गुनी , पूर्व भाद्रपद - उत्तर भाद्रपद ।

भारतीय ज्योतिष में नक्षत्रों की महत्ता को इसी से समझा जा सकता है कि एक नक्षत्र के चार विभाग कर उन्हें चार चरणों में बाँट कर प्रत्येक चरण को एक अक्षर आबंटित कर दिये गए हैं और इन्ही अक्षरों से भारतीय पद्धति में व्यक्ति का राशिः नाम रखे जाने की परम्परा रही है , इस राशिः नाम का उपयोग शुभ कार्यों के समय किया जाता है इसी कारण से भारतीय ज्योतिषीय परम्परा के मानने वालों के दो नाम होते है ,जैसा बता चुका हूँ एक राशिः नाम और दूसरा प्रसिद्ध नाम जिसका उपयोग रोज़मर्रा के जीव में और पुकारने के लिए किया जाता हैएक नक्षत्र का मान 13*- 20'-00" [ 13 डिगरी 20 मिनट अथवा अंश- कला ] होता है अतः प्रत्येक नक्षत्र-चरण का मान = नक्षत्र /4 = 13*-20'-00'' /4 = 800'/4 = 200' = 3*20'-00 होता है

ज्योतिषीय गणना के लिए कुल सत्ताईस नक्षत्रों का उपभोग करते हैं , 27 नक्षत्रों का कुल मान 12 राशियां होती है , एक राशिः का मान 30* [ 30 डिगरी ] होता है ; इस प्रकार 27 नक्षत्र गुणें 13* -20'= 360*/30*= 12 राशियां होता है । 360* उस वृताकार पथ का मान है जिसपर चल कर हमारी पृथ्वी एक वर्ष अर्थात 365 दिवसों और लगभग 6.25 घंटों में सूर्य का एक चक्कर लगा लेती है ,एक दिवस की गणना भारतीय पद्धति में सूर्योदय से सूर्योदय तक से करते हैं इसका मान [दिवस=वासर का मान सूर्योदय से सूर्योदय तक का ] वर्ष के कुछ विशेष अवसरों को छोड़ कर सामान्यतः घडी के घंटो से 24 घंटे नही होते है ; जब कि पाश्चात्य पद्धति में दिवसों की गणना अर्ध-रात्रि से र्ध-रात्रि तक के मध्य की जाती है ;अर्ध -रात्रि सदैव घड़ी में रात्रि के 12.00 अथवा 00.00 बजे ही मानी जाती है , अतः पाश्चात्य पद्धति में दिवस मान सदैव घड़ी के घंटों से 24 घंटे ही होते हैं

{ जारी है }



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