सोमवार, 1 दिसंबर 2008

फलित कथन की अति-सरल पद्धति

कालचक्र(अतिरिक्त )
[ ज्योतिष्य ]
"सर्वप्रथम स्पष्टकर देना उचित होगा कि मैं जन्म चक्र को 12 भावों में बाँटते समय , प्रत्येक भावः को ३०*{ अंशों=डिगरी} का ही मान कर सारी विवेचनाएँ करता हूँ, अर्थात सम-भाग भाव नियम को ''देहरी-दीपक न्याय के सिद्धांत‘” के साथ मान्यता देता हूँ"
मैं यहाँ पर जिस पद्धति का प्रयोग करूँगा ," उसे मैंने ' भावः आयु -वर्ष पद्धति ' कहा है''।
मेरा
उद्देश्य इस लेख द्वारा यह बताना है कि किस प्रकार से ज्योतिष्य के प्राचीन सिद्धांतों के आधार पर तार्किक विवेचना कर के सटीक फलित कथन किया जा सकता है><<>>>निम्नलिखित जन्मांग-चक्र को उदहारण के रूप में लेते हुए ,इस विवेचना-पद्धति यथा :; '' भावः आयु-वर्ष पद्धति '' के व्यवहारिक पक्ष का अध्ययन करेंगे :-<>


>जन्म २दिसम्बर १९४८ गुरूवार ,जन्म समय लगभग १८:४५ {अयनांशः —कृष्णामूर्ति }”
लग्न -मिथुन {1*- 45'-22'' /तृतीय भावः में शनि सिंह राशि में ,
/पंचम भाव तुला का शुक्र एवं केतु /षष्टभाव –वृश्चिक कासूर्य,तथा बुध //सप्तम भाव –धनु का चंद्र ,गुरु वा मंगल /एकादश भाव में राहू[लग्न से ग्यारहवां];
[जन्म नक्षत्र :मूल नक्षत्र तृतीय चरण ]
जन्म पर केतु महादशा भोग्य[अवशेष ]
=2 वर्ष / 4 माह / 29 दिन
>>>>.सामान्य चर्चा :----------------> अभी ज्यादा तकनीकी विवरण नही दे कर , केवल स्थूल-चर्चा द्वारा अपने पाठको को मात्र विषय से परिचित करना चाहता हूँ , तकनीकी विवरण मेरी अगली पोस्ट से आने शुरू होंगे

"आधुनिक विज्ञान चाहेजो कहेu , मनुष्य क्या '' चर-अचर'' सभी, अर्थात सम्पूर्ण-सृष्टि अपने प्रारब्ध या भाग्य के ही आधीन होती है "
  • ''इस पद्धति में एक भाव को एक आयु वर्ष के बराबर मान कर फलित की गणना की जाती है ''लग्न से बारहवें [12 वें ] भावः तक ,''12 : 12 वर्षों '' की आवृतियाँ होती हैं जिसे मैंने '' आयु युग-चक्र '' कहा है पहली आवृति : लग्न सेआरम्भ करके 12 वें भावः तक जातक के जन्म के पहले वर्ष से लेकर बारहवें वर्ष की आयु तक को ; दूसरी आवृति इसी ' भावः चक्र ' द्वारा , आयु के 13 वें वर्ष से लेकर 24 वें वर्ष की आयु तक को प्रर्दशित करते हैं , इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए
  • हम यहाँ पर जातक की आयु के सोलहवें वर्ष { २ -दिसम्बर-१९६३ ई० से आरंभ } को विचार के लिए ले रहें हैं <==> जो लग्न से चतुर्थ भाव: से प्रकट होता है , '' आयु युग -चक्र ''की दूसरी आवृति में आता है
  • सूर्य पुत्र शनि भाग्य धर्म तथा पितृ भाव अर्थात नवम् भाव का कारक होने के साथ -साथ भाग्य ::प्रारब्ध का नैसर्गिक या स्थायी कारक भी है // इसी केसाथ साथ शनि इस जन्मांग में नवम् भावः का भावेश {स्वामी }भीहोकर तृतीय भावःमें बैठा है यहाँ पर शनि श्रम तथा प्रारब्ध [ भाग्य ]का प्रतीक एवं उच्च-शिक्षा का दोहरा कारक हो जाता है , विषय वार नवम भाव का स्थायी कारक होने एवं नवम् भावेश होने के कारण भी
  • शनि का राशीश प्रकाश का कारक सूर्य [ तृतीयेश ] , यश-कीर्ति के भावः[चतुर्थ ] के स्वामी चतुर्थेश बुध जो लग्नेश भी है [[ लग्न =उद्यम ,पदर्शित सफलता ,जय ]] के साथ , शत्रु : जय भावः षष्ठ भावः में लाभेश मंगलकी ही दूसरी राशिः वृश्चिक में बैठा है चतुर्थ-भावः ही स्कूली -शिक्षा को पदर्शित करता है तृतीय भावः लेखन काकारक है , जब कि ग्रहों में बुध , जो यहाँ लगनेश-चतुर्थेश है , लेखन-कार्य का कारक होता है
  • बुध स्कूली-शिक्षा { चतुर्थ-भावः भावेश } के सन्दर्भ में ,प्रयत्न =कोशिश {लग्नेश } से ,परीक्षा {तृतीय भावः} नामक शत्रु { षष्ठ भावः } पर लेखन {तृतीय भावः तथा बुध } में श्रम { शनि } एवं मेधा {पंचम भावः} औरप्रतिउत्पन्न-मति {बुध} नामक शस्त्र के प्रयोग से संघर्ष {लग्न एवं षष्ठ } में सफलता {लग्न} ,विजय-लाभ { एकादश ,लग्न तथ षष्ठ भावः } दिलवाई और जातक का नाम जनता के मध्य प्रकाशितहुआ {चतुर्थ-भावः एवं सूर्य }
  • वैसे तो शनि का बैठना अशुभ नही होता जब तक की बहुत अधिक विपरीत परिस्थितियाँ हों शास्त्रों में शनि का देखना {दृष्टि} और गुरु का बैठना { सहचर्य } अशुभ कहा गया है यहाँ पर एक बिन्दु विपरीत है शनि सूर्य का पुत्र माना गया है, शनि को तो पिता सूर्य का नैसर्गिक शत्रु कहा गया है, परन्तु पिता सूर्य को पुत्र शनि का शत्रु नही माना गया है; इस प्रकार पुत्र शनि तो पिता का शत्रु है , परन्तु पिता सूर्य ,पुत्र का शत्रु नही है
  • फलित क्या रहा ? ———->शुभ: जातक ने एजुकेशन बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में सफलता प्राप्त की लोगों‘ में‘यश- कीर्ती‘ “ चतुर्थ भाव के भागी बने , नाम प्रकाशित हुआ {सूर्य की राशि सिंह में शनि है } इस के लिए लेखन कार्य (तृतीय भाव) को प्रदर्शित करता है :: परीक्षा में लेखन कार्य , श्रम (शनि) के साथ करना पडा- बुद्धि चतुर्थ भावः जिस का स्वामी प्रति-उत्पन्नमाति बुध यश कीर्ती कारक सूर्य के साथ जय-स्थान में ,लाभेश एवं तृतीय भावः कारक मंगल के ही दूसरे भाव में (वृश्चिक राशि में ) एक साथ बैठे हैं। अतः यश-कीर्ति का पद लाभ दिया


  • यह शुभ फलित 16 वें आयु-वर्ष के प्रथम-पूर्वार्ध में प्राप्त हुआ मार्च से अप्रैल तक परीक्षाएं चलीं मई या जून के अन्तिम सप्ताह मेंपरीक्षाफल आया जातक की '' शुक्र महादशा में शनि भुक्ति में शनि अन्तर-इस ''{ विंशोत्तरी } दिनांक 1 मार्चको आरम्भ हो कर 1 मई 1967 तक चली
    "क्या सभी कुछ शुभ ही शुभ रहा ? !!!!नही !!!! १९६४ मई में रेलैप्स टायफ़ायड ,और अक्तूबर में दायां हाथ टूट गया ।" - : : अब हाथ टूटने कि घटना कि विवेचना करेंगे : ----> इस समय जातक की शुक्र महादशा ,शनि भुक्ति बुध अन्तर दशा चल रही थी
    1964 आयु वर्षेश बुध [चतुर्थेश =सोलहवां वर्ष ] , तृतीयेश सूर्य के साथ [ दाहिना हाथ :: तृतीय भावः] षष्ठ भावः मेंरोग-शोकभाव] मंगल कि एक राशि वृश्चिक पर बैठा है ओर मंगल तृतीय भावः का नैसर्गिक कारक भी है अतः मंगल स्वयं हाथका प्रतीक होकर तृतीयेश सूर्य और अपने घोर शत्रु बुध को अपनी राशि में समेट कर सोलहवें वर्ष कि आयुमें हाथसम्बंधित फलित देने के लिए पूर्ण अधिकृत हो जाता है लग्न चक्र में तृतीय भावः में ,तृतीय भावः से षष्ठ भावः [ तृतीय भावः का रोग -शोक ] का स्वामी [ भावेश] शनिबैठा है ; शनि ही जन्म राशिः[ या चंद्र लग्न ] से द्वितीय एवं तृतीय भावों का भी स्वामी है :: जो जन्म लग्न से क्रमशः अष्टम [दुर्घटना ,आकस्मिक घटनाएँ ] नवम् भावः हैं राहू, मंगल के आधिपत्य वाले भावः,जन्म लग्न सेएकादश: भावः में; शनि के अधिपत्य के भावः से तीसरे -चौथे बैठ कर , विशेष रूप से चंद्र-लग्न से तीसरे भावः [जन्म से नवम् भावः ] से तीसरे बैठ कर "भावत भावाम नियम-सिद्धांत " के परिपेक्ष्य में मेरे कथन का प्रबलसमर्थन कर रहा हैं अष्टमेशशनि, मंगल , राहू एवं सूर्य से आपस में सम्बन्ध बना कर ये सब ग्रह दुर्घटना की बड़ी प्रबल सम्भावना का योग बना रहे है अपनी स्थितियों के अनुसार '' इन सबों का सम्मिलित प्रभाव या तो बहुत बड़ाआकस्मिक लाभ अथवा फ़िर दुर्घटना देता है '' जो कि दोनों ही यहाँ प्राप्त हुए :->आकस्मिक रूप से लाभ में हाई-स्कूल परीक्षा पहली बार में प्रथम श्रेणी में उत्तरीण की , जब कि उन दिनों पूरे, विशेष रूप से उत्तर भारत में यूपी एजुकेशन बोर्डकी परीक्षाएं बड़ी कठिन व सम्मानजनक मानी जाती थीं[जन्म-लग्न से एकादश भावः=लाभ भावः कासंबंध होने के कारण परन्तु राहू, राहू केराशिश:षष्ठेश मंगल ओर तृतीयेश सूर्यको का रोग-शोक भावः षष्ठ में बैठने के कारण से दुर्घटना में हाथ टूटने के रूप में अशुभ फलित प्राप्त हुआ हाँ यहअवश्य रहा की दोनों घटनाओं का समय अलग-अलग रहा ,दोनों घटनाओं के समयांतराल का कारण जन्मांग-चक्र केअन्य कारकों के प्रभावके अध्ययन करने पर स्पष्ट हो जाता है
    आप ने देखा की किस प्रकार मैंने केवल जन्म चक्र एवम् भावाधार सिद्धांत से सोलहवें आयु वर्ष की संभावित प्रमुख घटनाओं का खाका स्पष्ट रूप से खीच दिया कोई भी बात छिपाई नही है ,जिन नियमों से विवेचना की गयी वे ज्योतिष्य सर्वमान नियम हैं जो अनादि काल से प्रयोग में रहे हैं ;
    अब अगर इसे विंशोत्तरी महा दशा पद्धति एवम् गोचर के साथ प्रयोग किया जाए तो कैसा रहेगा ???!!
    शेष अगले अंक-फलित कथन की अति सरल पद्धति-2में अन्योनास्ति
    कालचक्रकी
    'चौपाल' के 'झरोखा' से 'चिटठा'




    {'कबीरा' का [विशेष:: यह लेख इसी नाम से प्राकाशित था परन्तु कुछ तकनिकी कारणों से पूरा का पूरा पुराना ब्लॉग समाप्त कर के उसी नाम से नया ब्लॉग बना लेख को विस्तारित कर पुनः प्राकाशित किया जारहा है


2 टिप्पणियाँ:

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा आपने, बधाई.
कभी मेरे ब्लॉग शब्द-शिखर पर भी आयें !!

Nirmla Kapila ने कहा…

आपका ये ब्लोग देख कर तो और भी उत्साहित हूँ मैने भी बहुत देर कृ्श्णाआमूर्ती पदती का अभ्यास किया है पहले मेरा फलित सही नहीं होता थ फिर क्यों कि अक्षाँस्ग और रेखाँश इस शहर के हिसाब से नहीं थे पुस्तकों मे 31-23 ही मिल्त थ हमरे शहर का 31-12 था फिर मैने 31-12 का एक चार्ट बनाया जिस के लिये् मुझे बहुत मेहनत करनी पडी मै केवल प्रश्न कुन्ड ली पर ही ध्यान केन्द्रित कर्ती थी काफी आगे निकल गयी थी मगर 1990 मे मेरे जवान बेटे का मर्डर हो गया उसके बाद मैने जोतिश छोद दिया था भार्तिय जोतिश मे कभी 2 कुछ देख लेव्ती हूँ बस आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा और मेरे मन्पसंद विश्य भी बहुत बहुत शुभकामनायें आभार्

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